Bad!!खोट!!

He was in a very big hole in the scales, 
Fitranean himself defamed the same fate, 
There were lots of good luck in front of you 
Constructed the instruction against blindfolded 
Where were the scratches in the mirror that was present in your mirror 
Cleaned the blurry of the eyelids in their blindness, 
The burden of guilt 
Gafil did a great deal of understanding, 
The mountains of the mountains come and go down in the lowlands 
Rain understands that he always did a very good job, 
It is very difficult to get stuck in the stomach 
The sand on the banks of the river gave us the hug, 
Measure means to weigh the mean of weighing 
Napaa not towel weighed not weighed, 
The fame is achieved with the happiness of a few moments 
Cleanliness by non-proficient work done for Iman,
Wakta kayamaat is on the account book arguably,
Then there will be remorse what is the eighth stomach. 
“Pkvishvamitra”
खोट!!

नीयत में था बहुत बडा खोट तराजू में लगाकर पासंग

फितरतन खुद के लगाये उसी पांसग को बदनाम किया,

नेकनीयती के रास्ते भी तो बहुत थे सामने तेरे ऐ अदम

बांधकर आंखों पर पटटी खिलाफ हिदायत काम किया

खरोंच कहां थी उन आईनों में जो तेरे रूबरू थे मौजूद

अपने अंधेपन में आईनों के धुंधलेपन को साफ किया,

गठरिया बांधकर बहुत बढा लिया है गुनाहों का बोझ

समझता रहा गाफिल बहुत होशियारी का काम किया,

पहाडों की मिटटी आ जाती है बहकर नीचे मैंदानों में

बारिश समझती है हमेशा उसने बहुत नेक काम किया,

वजूद खोकर मंजिले पाना होता है बहुत तकलीफदेह

नदी किनारे पडी रेत ने हमें यह हके पैगाम अदा किया,

नापने का मतलब है नापना तौलने का मतलब तौलना

नापकर नहीं नापा तौलकर तौला नहीं फर्ज हराम किया,

माना फरेब से हासिल हो जाती है चंद लम्हों की खुशियां

सफाई से नफा नाजायज ने ईमान का काम तमाम किया,

वक्ते कयामात पर होता है हिसाब किताब तमाम यकीनन,

तब होगा पछतावा क्या फिजूल इक्टठा ताम झाम किया।

“Pkvishvamitra”

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Silent wish!!खामोश चाहत!!

Perhaps the big culprit was clear that he wanted to make boots 
In today’s mazaras and tombs which are being unaware today, 
Roshan Alam also has similar darkness in existence 
Tadapkar’s tales of loyalty are shedding ash, 
We have seen sadness in the rugged settlements.
In the desert, how are you screaming? 
Pick up the baggage of the bag which is for the journey 
The doors waiting at the door are moaning, 
Pigeons in the courtyard of tombs and marauders
The warriors are calling the corpses dead, 
This is also a special place in life. 
Here are the flavors of Amavasya Aman, fluttering with fries, 
This bustle and the sound of the piercing sound 
In the city of blind, the bedrock baron is running the mill, 
I was always searching for 
We are now tempting the wanderings of desperate wants. 
“Pkvishvamitra”
खामोश चाहत
शायद बडी पाक साफ थी वह चाहत की बुलन्दियां

उजडे मजारों और मकबरों में जो आज कसमसा रही हैं,

रोशन आलम में भी ऐसे ही अंधेरों का वजूद है मौजूद

तडप तडपकर वफादारियों की दास्तां अश्क बहा रही हैं,

उजडी हुई बस्तियों में देखी है हमने गमगीन खामोशी

वीरानों में फिर कैसे दाना चुगती चिडियायें चहचहा रही हैं,

उठाकर सामान की पोटली निकला है सफर के लिए जो

दरवाजे पर लगी हुई टकटकिया इंतजारियां कराह रही हैं,

मकबरों और मजारों के आंगन में गुडगुडाते हैं कबूतर

वीरानियां लहक लहककर लाशों को लोरियां सुना रही हैं,

ये भी जिंदगी के ही कुछ खास मुकाम हैं सामने हमारे

यहां पर फसादों से बेवास्ता अमन की फस्ले लहलहा रही हैं,

यह भीडभाड और यह कानों में चुभने वाला शोर शराबा

अंधों की नगरिया में अपाहिज बांदियां चक्की चला रही हैं,

खोजता फिरता था मैं हमेशा ही पुरसुकूं हसीन वादियां

कसम से हमें तो अब वीरान चाहतों की मजारें लुभा रही हैं।

“Pkvishvamitra”

Masks!!मुखौटे!!

Masks

The layers of layers on the sides are clustered on the faces 
All the pickups are fizzled out, 
People keep masks on masks like this 
Realities become dwarf in front of them, 
We have put lots of colorful layers on the faces 
Still do not know why the conspiracies are successful, 
They have tilted the knot of the textures and shoulders our shoulders 
How many false reports are so weighty, 
The powers of vigilance are achieved only by all sinners 
The paper flowers are displayed in the bouquets, 
In front of the cloak 
Fake smell also makes the eyes dry, 
He has started reading mischief even now. 
Whose bad habits become a mask of goodwill, 
False lies in the same way, silent reality 
The seekers become victims of the realization of the real, 
We are thrown out and thrown by the truth 
Just the realities of truth become badgamania, 
Truth is not a sign of truth 
Chadhi masking is done on masks, 
When the Tired Being Desperated 
In the same way, only the lives of the people are done, 
What is the truth and what can be true Yarrow 
Just get entangled in puzzles and become entangled puzzles. 
“Pkvishvamitra”

चेहरों पर चढी हुई हैं परत पर परत की ही परतें

उतारने की सभी कोशिशे फिजूल हो जाया करती हैं,

लोग चढाये रखते हैं मुखौटों पर मुखौटे कुछ इस तरह

हकीकतें तमाम उनके सामने तो बौनी हो जाया करती हैं,

हमने उतारी हैं कितने ही चेहरों पर चढी हुई रंगीन परतें

फिर भी न जाने क्यों साजिशें कामयाब हो जाया करती हैं,

वो बनावट के पुलिन्दे ढोते ढोते झुक चुके हैं कंधे हमारे

तमाम झूठी इबारतें कैसे इतनी वजनदार हो जाया करती हैं,

असरदारी की हिकमतें हासिल हैं सब बदकारियों को ही

कागजी फूलौ पत्ती गुलदस्तों में नुमाईशी हो जाया करती हैं,

असली रंग हो जाता है कितना बदरंग नकली के सामने

नकली खुश्बू से भी तो फिजायें महकदार हो जाया करती हैं,

वो कुपढ भी पढाने लगे हैं अब इल्मौ किताबत की बातें 

जिनकी बदकारियां मशहूरियत का नकाब हो जाया करती हैं,

नकली में ही उलझी होती है कहीं खामोश सी असलियत

तलाश असली की दुश्वारियत की शिकार हो जाया करती हैं,

उधेड उधेडकर फेंकते रहते हैं हम सच को तमाम जिंदगी

बस सच की अहसासियतें बदगुमांनिया हो जाया करती हैं,

सच्चाई की पडताल नहीं होती है किसी वहम का सबब

मुखौटों पर चढी मुखौटागिरी ही अंजाम हो जाया करती हैं,

थका हुआ सा मायूस दिल कब रोकता है पडताली मुहिम

कोशिशे बदस्तूर में ही जिंदगानियां तमाम हो जाया करती हैं,

सच क्या है सच क्या था और सच क्या हो सकता है यारो

बस उधेडबुन पहेलियों में उलझी पहेलियां हो जाया करती हैं।

“Pkvishvamitra”

Reality!!/हकीकत!!

आईने भी हो गये हैं तमाम ही फिजूल अब तो

चेहरे की बुढाती हुई हालत को चिढाया करते हैं,

देखना चाहता था उनमें अपनी औकाते अदम

कम्बख्त हमेशा हकीकी सच्चाई छिपाया करते हैं,

खुद ही थी खुद को परखने की वो तमाम कोशिशें

अधूरे अरमानों को बनाकर गीत गुनगुनाया करते हैं,

इधर से चले थे उधर पहुंचकर फिर इधर ही आ गये

डबडबाती आंखों में निशाने जख्म छिपाया करते हैं,

एक पुरानी सी किताब समझकर टटोलते हैं अजीज

अश्कों की टपक से भीगा हुआ बरखा पाया करते हैं,

बस्तियां बदल गयी हैं चौराहे हुए हैं सभी अजनबी से

भीड में होकर भी मौजूद खुद को तन्हां पाया करते हैं,

समझ बदली सोच बदली ख्याला भी बदले हैं तमाम

नये जमाने की भूलभूलैंया में यूंही रास्ता जाया करते हैं,

बेमुरव्वत आईने भी तो नहीं बदल पाये हैं अपनी जात

फालतू में हम भी तो जिद के शिकार बन जाया करते हैं,

रास्ते भी रहेंगे यहीं और मंजिले भी ऐसे ही यहीं रहेंगी

मंजिल पर पाने की हवस में मुसाफिर मिट जाया करते हैं,

अब मत खोलना मेरे बीते हुए कल का कोई भी परचा

बदलते हुए मौसम की तरह मुकाम बदल जाया करते हैं।।

Reality!!

Even the mirrors have become so fragile that now
In the face of the face of the face, 
Wanted to see them 
Humiliation always hides the truth of truth, 
It was itself that all of the efforts to test themselves 
Make songs incomplete by making incomplete Armanas, 
They came from here and came here again 
Scary eyes hide the scars in the eyes, 
Aziz as a chronic book 
The dried sesame seeds are found to be dried, 
Settlements have been changed, crossroads have been made from all strangers 
Being present in the crowd, we find myself sheltered, 
Understanding changed thinking changed Khali also have changed 
In the new-age labyrinth, they go the way, 
Unimportant mirrors have not even changed their caste 
In spite of this, we also become victims of insolence, 
There will be stays here and the floor will remain the same here. 
To get to the floor, the passengers are wiped out, 
Do not open any tomorrow of tomorrow 
As the changing season, the elements change. 
“Pkvishvamitra”

हिम्मत!!/Courage!!

बहुत जोडा घटाया है हमने तमाम जिंदगी 

हथेलियों की आडी तिरछी लकीरों का हिसाब,

जोड घटा और गुणा भाग की थकाऊ तकरार

देकर लेकर और लेकर देकर आया शिफर जबाब,

नीचे से उठा है उपर की ओर सभी का ही वजूद

तकलीफें भी रहमतें भी बरसी हैं यहां बेहिसाब,

दर्द की परछाईयां बनती रही हैं यादगार दुपटटा

हर एक जख्म से उठी है हर एक टीस लाजबाब,

तौहफेनुमां तन्हाईयां हैं उल्फत के जाम की तरह

कम्बख्त हर चेहरा हो तो गया ही है अब बेनकाब,

फेंक दिये हैं उठाकर सब पुराने हिसाबी बहीखाते

माथापच्ची की दिमागी चक्की है हिसाब किताब,

गंदी नालियों को लांघकर बढना होगा हमेशा आगे

कमोबेश जमाना तो नहीं कहेगा यारो नाकामयाब,

दिल की बही दिमागी खाते गफलत के हैं समुन्दर

नयी रोशनी नयी शुरूआत ही है एक माकूल जबाब,

आडी तिरछी लकीरें बनाती रहें मनचाहा मकडजाल

खडे हो गये हैं हम भी अब जुटाकर हिम्मत बेहिसाब।।

“Pkvishvamitra”

courage!!

Very addicted, we have all the life 
The horoscopes of the slabs, 
Due to the deterioration of the joint and multiplication part 
By giving and taking away, 
The bottom has been lifted from above, everyone’s existence 
The troubles also have been buried even here, 
The shadows of pain are becoming more memorable 
Every one of the wounds has emerged from the wounds, 
Tauhfenumam talaiyaias are like jam of ULFA 
If you have face every face, then you are now exposed, 
All the old accounting books are lifted by throwing 
Mathapachchi’s brainchild is the account book, 
To advance the filth of the rivers, there will be an increase 
If not more or less time, will not say Yaro is unfortunate, 
Heart’s books 
The new light is a new beginning, 
Make a skewed streak 
We are still standing, we are too busy to raise our courage.

The Reality!!असलियत!!

Sometimes the high rise buildings on their height 
Raises questions on their own basic fact, 
Buldhani’s are the foundations of old chittagong graveyards 
Tangled eyes show the status of the height, 
The sky also comes with powerful towers on the ground 
Something similar teaches books of history, 
They are hidden in the ruins of their ruins 
The scattered bricks of the walls show the seam of time, 
Black hair poverty in white hair 
The erosion caused by the tooth decay is shown, 
Freshly pressed rooms for fresh fresh air like Fafade 
Easy breaths tell the price of a broken sauce, 
There is also a few steps to go 
The calculation of the shaking dried leg burden, 
Throw away the burden of the burden from my shoulder to my friends 
In old age, everyone’s neck becomes dingy.
||असलियत||

कभी कभी उंची इमारतें अपनी बुलंदी पर इतराकर

अपनी ही बुनियादी औकात पर सवाल उठाया करती हैं,

बुलंदियों को होती हैं महसूस बुनियादें पुरानी सी कब्रें

ऊंचाई पर टंगी आंखे जमीन को हैसियत दिखाया करती हैं,

आसमान को ताकती मीनारें भी आ गिरती हैं जमीन पर

कुछ ऐसा ही तो पाठ इतिहास की किताबें सिखाया करती हैं,

खण्डहरों की बदहाली में ही छिपा है उनका सुनहरा कल

दीवारों की बिखरी हुई ईंटे वक्त का सितम दिखाया करती हैं,

सफेद बालों की अमीरी में झांकती काले बालों की गरीबी

दांतों के झडने से बने झिर्रियां असलियत दिखाया करती हैं,

ताजी ताजी हवा के लिए तरसते बंद कमरे जैसे फफेडे

आसान सी सांसों कीमत उखडी हुई सांसे बताया करती हैं,

चंद कदम चलना भी होता है कभी कभी बहुत ही दुश्वार

कंपकंपाती सूखी टांगे बोझ का हिसाब बताया जा करती हैं,

उतार फेंको गरूर का बोझ अपने कंधो से ऐ मेरे दोस्तों

बुढापे में तो सभी की ही गर्दनें डुगडुगी बन जाया करती हैं।

“Pkvishvamitra”