RIP!!//श्रद्धांजलि!!

#GauriLankesh


RIP!!

A stroke was a pair of junkie 
The blood clothed in the dust, 
Death toll 
Dizziness continued to haunt him, 
The hull of truth was not easy to pause 
All ages kept the threats of threats, 
Life is alive to live 
Why did he keep on sticking to his life, 
The pen does not have an instant silence 
There was a wailing in the dead group, 
He had a feeling of hovering over the head 
Do not know why trusting on the Nizam,
कतरा कतरा जोडी थी जो जिंदगी

लहू के कतरे कतरे बनकर बहती रही,

झूठ की खिलाफत बना मौत का सबब

जिस्मानी छेद सहलाते हुए कराहती रही,

सच की पतवार थामना नहीं था आसान

तमाम उम्र धमकियों की धौंस सहती रही,

जिन्दा रहने के लिए तरसती है जिन्दगी

वह क्यों यूंही जिंदगी दांव पर लगाती रही,

कलम की तासीर नहीं है खामोश रहना

मुर्दा हो चुकी कौम में अलख जगाती रही,

उसे था सिर पर मंडराते खतरे का अहसास

न जाने क्यों भरोसा निजाम पर जताती रही।

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Poor!!//दरिन्दा!!

Blindfolded 

In the darkness of stupidity eating stumbling, 
Wanting to get god on the ground 
The goddess was making Goddess herself, 
Wanting to land on the ground 
The gothic was telling angels only the angel, 
He had to lay his hand across the river 
Oops !! he was telling the owner of two jahan, 
The wires were getting wires where 
The blind eyes of the eyes were telling the innocence, 
Fakiri was in the glance of the wealth of wealth 
The false listener of the idol was telling him magic, 
Glittering shop 
Bawasa was telling Dera by Ibadat’s elm, 
Kubadi’s fine is found on 
Abhailas’ screams were telling unhabad sounds, 
Was immersed in the sea of ​​crime itself. 
He was telling him the ship carrying the sea.||दरिन्दा||
आंखों पर बांधकर यकीन की पटटी

बेवकूफी के अंधेरे में ठोकरें खा रहे थे,

खुदा को जमीन पर पाने की चाहत में

जिस्मानी पुतले को ही खुदा बना रहे थे,

जमीन पर जन्नत उतारने की चाहत में

वहशी दरिन्दे को ही फरिश्ता बता रहे थे,

उसका हाथ थामकर करना था पार दरिया

ऊफ!!उसे दो जहान का मालिक बता रहे थे,

तार तार हो रहे थे जहां आबरूयों के दुपटटे

आंख के अंधे नैनसुखिये रूहानियत बता रहे थे,

फकीरी में थी दौलत के तिलस्म की चकाचौंध

इबादत के झूठे तलबगार उसे जादू बता रहे थे,

चमक दमक से सजी हुई फरेबी धंधे की दुकान

इबादत के इल्म से बावास्ता उसे डेरा बता रहे थे,

कबाडी की छान पर मिलता है भला फूंस कभी

अबलाओं की चीखों को अनहद नाद बता रहे थे,

डूब था जो खुद ही गुनाह के समुन्दर में गले तक

उसे ही समुन्दर पार कराने वाला जहाज बता रहे थे।

“Pkvishvamitra”

करूणा!!//Mercy!!

नोट-यह फोटो एक टवीट से कॉपी किया है,इस फोटो में बच्ची दिखाई दे रही है उसे मैं काल्पनिक नाम करूणा दे रहा हूं।

Note- This photo has been copied from a tweet, I am giving a fancy name to the child in this photo that I see. 
Tiberia that was struggling with unhealthy tendencies 
Tathagata was present in the heart of Buddha, 
Violence is nurtured in the womb of pregnancy 
Balosubhur Dada, with the blessings of Goddess Avodh Vaaruna, 
Good is the inherent inherent nature of human beings 
Divine omnipotent mercy
मनोअवसादी प्रवृत्तियों से संघर्षशील रही जो तृपणा

तथागत बुद्ध के हृदय में विद्यमान थी ऐसी ही करूणा,

हिंसा के गर्भ में पोषित पल्वित होती है गर्भस्थ अहिंसा

बालसुलभ दयाशीलता से ओतप्रोत अबोध व्य वरूणा,

यथेष्ट है सचेष्ट अन्तर्निहित प्राकृत उदभित मनुष्यता

ईश्वरीय स्वभावयोचित सर्व सुलभ परमेश्वरीक करूणा।।

“PKvishvamitra”

Religion’S Shop!!धर्म की दुकान!!

What is doing while sleeping is the drama of gold 
Why the society wakes up by giving voice to that society, 
Rugged stereotypes are entangled in the net 
Why do you solve the rhetoric of abusive puzzles?
They are made up of religion’s Chola religion shop 
Why do you have such a horoscope, 
Play the game of dresses 
Why are you unaware of knowing / knowing everything? 
Glow of the world 
Why become blindfolded for salvation / salvation? 
Where God is hidden in God Narayan 
Why are the runners achieving unavailable, 
The sinner searches only for the path of expansion of sin forever 
Why do the bowels become disorders in front of them?
जागते हुए भी जो कर रहा है सोने का नाटक

उस समाज को क्यों आवाज देकर जगाते हो,

सडीगली रूढियों के जाल में उलझे हुई हैं जो

अबूझ पहेलियों के ताने बाने क्यों सुलझाते हो,

वे बने हैं पहनकर धर्म का चोला धर्म की दुकान

ऐसे बेहरूपियेपन को क्यों अपना शीश नवाते हो,

खेलते हैं पहनावे को बनाकर ढाल हवस का खेल

सबकुछ जानकर/देखकर क्यों अन्जान बन जाते हो,

जगत की मोहमाया के बंधन तोडने की अंधी ललक

मोक्ष/मुक्ति पाने की खातिर क्यों अंधभक्त बन जाते हो,

नर में कहां छिपा होता है परमेश्वरीक ईश्वरीय नारायण

अप्राप्य को प्राप्त करने वाले धावक क्यों बन जाते हो,

पापी तो खोजता ही है पाप के विस्तार का मार्ग सदा

इनके सम्मुख होकर नतमस्तक क्यों विकार बन जाते हो।

“PKvishvamitra”

The Pain//दर्द!!

Check out @SirRavishKumar’s Tweet: https://twitter.com/SirRavishKumar/status/902942698260365314?s=09

Blowing in the Eyes 
Blizzards are heart-broken wounds, 
Desperate Succeeded to come out 
It has been signed, everything is finished, 
The buds crying in front of the little woods 
Understand that the sad eye opens up 
The lamb is put in front of the sheep 
By opening the door to the name of sure, 
Who has understood the dilemma of shame 
Silent, every person weighs their gains, 
Where do people read masked faces on the mask
Surely, a knife makes sure of murder, 
Carefully beware of A Baghban, these buds 
The poor people give each of the buds to the poor.
आंखों में उमडते घुमडते बेबस आंसू बनकर 

फफकते हैं बिलखते हैं दिल के दबे हुए जख्म,

बाहर आने के लिए हो चुकी बेताब सिसकियां

करती हैं मुनादी हो चुका है सबकुछ ही खत्म,

कमअक्ल बागबां के सामने रोती थी कलियां

समझेगा वो दुखडा आंखों की पटटी खोलकर

वहशी भेडियों के सामने डाल देते हैं वह मेमने

यकीन के नाम पर दिल के दरवाजे खोलकर,

समझा है कौन लाज के दुपटटे की कसमकश

खामोश है हरेक शख्स अपना फायदा तौलकर,

कहां पढते हैं लोग नकाब पर नकाब चढे चेहरे

यकीन की छुरी से यकीन का कत्ल हुआ करता है,

चौकस होशियारी से बचाओ ऐ बागबानों ये कलियां

हरेक कली रहे महफूज ये दिले गरीबां दुआ करता है।

“PKvishvamitra”

Way!!रास्ता!!

Time consuming toy 

She was playing with pakijas, 
Garur’s Badanuman Taj on his head 
God was mocking to prove, 
Understanding the World 
He was building the tehajib buildings, 
There were queues of the mirror around it 
Aankhe Mundand was embarrassing himself, 
The doors of the horror were in the grave 
He was preparing himself a gadder for himself, 
The raw bud was not able to blossom 
The effigy of Harmony was preparing Haram, 
Towel 
He was doing a soft hot meat business, 
It was easy to suppress untidy human screams 
His human being was buried in screams, 
The burden of waste wasted on the shoulder of life ruined 
Dadau was spoiling his way.वक्त को मानकर खरीदा हुआ खिलौना

वो पाकीजाओं से खिलवाड कर रहा था,

सिर पर लादकर गरूर का बदनुमां ताज

खुदा साबित होने का जुगाड कर रहा था,

समझ रही थी दुनिया जिसे अदबी बागबां

वो तहजीब की इमारतें बिस्मार कर रहा था,

यूं तो आईनों की कतारें थीं उसके आस पास

आंखे मूंदकर खुद को ही शर्मसार कर रहा था,

खौफ के दरवाजे हो चुके थे चौपट गरूर में

खुद के लिए खुद ही गडढा तैयार कर रहा था,

कच्ची कली नहीं बन पाई थी खिलकर फूल

हैवानियत का पुतला हरम तैयार कर रहा था,

फरेबी तराजू से तौलकर रूहानियत का सौदा

वह नरम गरम गोश्त का कारोबार कर रहा था,

बेबस इंसानी चीखें दबा देना लगा था आसान

अपनी आदमियत चीखों में दफन कर रहा था,

तबाह जिंदगी के कंधे पर बर्बाद आबरू का बोझ

लेकर बददुआयें अपना रास्ता खराब कर रहा था।

“PKvishvamitra”

The Factory//कारखाना!!

He stood up on this ground floor 

He wanted to fill his sky in arms, 
A statue of a leather-covered bone cage 
The world wanted to lock in the grasp, 
Does the swarm of firewood compete with the sun 
Himself wanted to be the land and the sky, 
He was spreading his kingdom to the blind 
A slight sank !! Wanted to be princes, 
Palace built on the grounds of intentions 
He wanted to decorate the hay with the physique of the living, 
Laughing rumor 
Mirror only wanted to show the mirror to the mirror, 
It was unnecessary that he trusted his belief 
He wanted to show god in his own shape, 
Understanding the people’s stupidity, their intelligence 
Wanted to run a fancy lavish factory.

!!कारखाना!!

वह तो खडा होकर इस ख्वाबी जमीन पर

बाहों में अपनी आसमान भरना चाहता था,

चमडे से ढका अस्थि पिंजर का एक पुतला

दुनिया को मुटठी में बंद कर लेना चाहता था,

जुगनूओं के झुंड का क्या सूरज से मुकाबला

खुद ही जमीन और आसमान होना चाहता था,

फैला रहा था वह अंधा होकर अपना साम्राज्य

एक मामूली सा रंक!! शहंशाह होना चाहता था,

इरादों की बारूदी बुनियाद पर बनाकर महल

जिंदा जिस्मानी बुतों से हरम सजाना चाहता था,

ठहाके लगाकर उडाता था वह समय की खिल्ली

आईना ही तो आईने को आईना दिखाना चाहता था,

बेवजह ही था उसे अपनी अक्ल पर फालतू भरोसा

अपनी शक्ल में जमाने को खुदा दिखाना चाहता था,

लोगों की बेवकूफी को समझकर अपनी होशियारी

 सनक भरी हवस का कारखाना चलाना चाहता था।।

“PKvishvamitra”