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रेत के असंख्य कणों में से एक कण मैं भी हूं यही मेरे अस्तित्व की वास्तविक नाप तौल है और यही मेरा वास्तविक परिचय है जो मुझे ज्ञात है।-प्रमोद कुमार एडवोकेट

Game!!खेल!!

शक नहीं है तरकश में छिपे हुए तीरों की नीयत पर

मगर डर कमान थामने वाले हाथ की सोच से लगता है,

बडी जालिमाना फितरत होती है कम्बख्त इंसान की

हर एक साजिशन हमला जाने पहचाने चेहरे का लगता है,

चेहरे पर आदमियत की नकाबी सजावट है बडा धोखा

हाथ अजनबी ही सही खंजर तो जाना पहचाना लगता है,

कितनी ही खा चुका होता है धोखा वो मासूम यकीन

जो जिगर किसी मुंडेर पर चहचहाता हुआ परिंदा लगता है,

दर्दे गम की इलाजे तजवीज बता देता है हर शख्स यहां

हरेक शख्स चोट खाया हुआ नामाकूल तजुर्बेकार लगता है,

एक जैसे दर्द और गम एक जैसे ही हैं शिकवे शिकायत

ये जहां नाउम्मीदियों की भंवर में उलझा समुन्दर लगता है,

जद्दोजहद के इन बवंडरों से बिखरा हुआ है हरेक घरौंदा

थके कदमों से आगे बढना खुद को ही आजमाना लगता है,

मंजिलों के निशानात ही तो होते हैं हकीकी कायदे सबक

बनकर मिटना मिटकर बनना यही खेल गैबियाना लगता है।

“Pkvishvamitra”

Game!!
There is no doubt on the principle of hidden arrows in quiver 
But fear comes from the thought of hand pausing, 
Big Lily is the person who is humiliating 
Every conspiracy attack seems to be a familiar face, 
The human face on the face is a lot of cheating 
Hand strangely, it is well known to know the right dangers, 
How many people have eaten, they are innocent. 
The liver gets a pinch of turban on a mound, 
Dada Gham’s elaborate responsibility tells all the people here 
Every person is hurt by an inefficient reputation, 
The same kind of pain and grief are the same as the complaint 
Where the Nawadis are in the vortex, 
Spread with these tornadoes of Jadozhad every house 
Moving forward with tired steps itself seems to be a challenge, 
Only the targets of the floors are the practical laws lesson 
Becoming by removing the eruption, this game seems to be Gabania. 
“Pkvishvamitra”

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Unconscious!!गैरमुनासिब!!

इधर जाना है गैरमुमकिन उधर जाना भी गैरमुनासिब

चौराहा सा बनकर यह जिंदगी असमंजस की शिकार है,

वो रिश्तों की तराजू में तौलते हैं हर एक जज्बात यहां

खलिशभरा बेईत्मिनानिना सबब ही फसलाना पैदावार है,

इंसानी बस्तियों से आदमियत तो हो ही चुकी है नदारद

कैसा वहशियाना जुनूनी नशा है कैसा ये नशीला खुमार है,

जानवर की आड में जानवरानापन के खूनी घिनौने खेल

कैसे बतायें कौन जुदा कौन है शरीक कौन इसमें शुमार है,

मातमी सबब तो है बस मातमी की ही लानतें मलानतें

जीने के हक से कर दे बेदखल कैसा ये तूफानी ज्वार है,

नफरत ने दी हिकारत को पैदाईश अलगावी आंगन में

यकीन नहीं हो पाता है यहां मौजूद आदमियत बेशुमार है,

कातिल करतब कातिलाना सोच के जहर बुझे हैं खंजर

फिजूल देते हैं दिलासा बस मामूली सी ही तो खरपतवार है।

“Pkvishvamitra”

Unconscious !!

It is also absurd to go absent 
This life is a victim of confusion by becoming a crossroads, 
They weigh in the balance of relationships, every emotion here 
Khilbhara Beethinanina is the only harvesting crop, 
Human beings have already been human beings 
How is this obsessive addiction, how is this intoxicant, 
Bloody abomination game of animal abuse 
How to tell who is the person who is involved in it,
It is all a misfortune for the mother of the mother.
What is the occupation of the typhoon of living? This is a tidal tide, 
Hatred has given birth to hikarat 
I can not believe that the humanity here is uncountable, 
The killer of the murderer thinking of the murderer is dying 
Dissatisfaction is only the slightest weirdness.

“Pkvishvamitra”

Understanding!!समझ!!

उस जमीन पर खडे होकर जो देती है कदमों को बिसात

बेइंतहां बेमुरव्वत चाहत की तालीम पायी जा सकती है,

दूर दूर तक फैले हैं रेत और मिटटी के जमीनी कैनवास

उम्दा ख्यालों की खूबसूरत तस्वीर बनायी जा सकती है,

हवाओं की तासीर में छिपे होते हैं तमाम नगमाई तराने

जिद सवार हो गर फूलो की मुस्कान चुरायी जा सकती है,

ऊंचे पहाड भी कराते हैं समुन्दर की गहराई का अंदाजा

खुद में उतरकर भी गहराईयों की थाह पायी जा सकती है,

पैमाईश के लिए गैरजरूरी है पैमाना कुछ मुआमलात में

बरसती आंखो से दर्दीली तकलीफ जतायी जा सकती है,

किताबीपढाकू कब समझते हैं खामोश शिकवे शिकायत

बेखुदी के आलम में तन्हां महफिल सजायी जा सकती है,

समझ समझकर समझा देंगे सबको जिंदगी के फलसफे

क्या बियाबान जंगलो को तहजीब सिखायी जा सकती है,

उम्मीदों की इस जमीं पर तामीर किले हैं कितने मजबूत

क्या हवाओ में लहराती हुई बुनियाद बनायी जा सकती है,

सुलझ सुलझकर भी उलझावियत का शिकार हैं उधेडबुनें

शायद पहेली बनकर ही कोई पहेली सुलझाई जा सकती है।

“Pkvishvamitra”

understanding!!

Standing on the ground gives the steps to the chessboard 
Unconditional training can be found, 
Far from far and wide sand canvas canvas 
A beautiful picture of a great idea can be made, 
All winds of hiding are hidden in Nagmai Tarane 
You can ride a stubborn smile of bull flowers, 
High mountains also give an idea of ​​the depth of the sea 
The depth of the depth can be found even by themselves, 
There is no need to measure the scope of measurement 
Severe pain can be expressed from the rainy eyes, 
When do you understand the book 
Relaxation can be decorated in the bedroom of unskilledness, 
Understand and understand everybody’s life 
Whether the bajwa forests can be taught in Tahajibi, 
Thamir fort on this land of hope is so strong 
Can the winding structure be built in air, 
Solve the problems of entanglement and solve the problem 
Perhaps a puzzle can be solved by solving puzzles. 
“Pkvishvamitra”

Fine workout !!फिजूल कसरत!!

Fine workout !!

The lost are the ones that exist in the root 

He is looking into past depths, 

The picture of humanity is staining 

I am building on the canvas of humanity, 

The look of change has changed 

I am changing the stereotypes of glass specs, 

All the victims have become victims of Ubasi 

Cutting old plant plants, 

That old lady mirror irritates the mouth 

Changing the map of Rehashuda Garhakhana, 

Changes in the morning and in the evening 

I am changing the hunt of change, 

We forgot keeping humanity seeds somewhere 

Looking for a city-city city in search, 

Where the instructions of elderly have been buried 

Looking for that missing Tahajib’s mazar, 

Change of thinking is too much to change 

Looking for the details of changing times, 

Changing the changing old-fashioned old frame 

Then I have been doing all the hard work. 

फिजूल कसरत!!

खो सी ही गयी हैं जो वजूद की जडें 

वह अतीत की गहराईयों में तलाश रहा हूं,

आदमियत की तस्वीर है धुंधलाई सी

इंसानियत के कैनवास पर उभार रहा हूं,

निगाहों के बदलाव ने बदल दी है नजर

बेढंगी सी ऐनक के आईने बदल रहा हू,

तमाम गमले हो गये हैं उबासी के शिकार

उखाड कर पुराने पौधे पौध बदल रहा हूं,

वो पुराना दीवारी आईना चिढाता है मुंह

रेहशुदा गरीबखाने का नक्शा बदल रहा हूं,

बदलती है सुबह शाम में और शाम सुबह में

बदलावियत का शिकार मैं शह बदल रहा हूं,

इंसानियत के बीज कहीं रखकर भूल गये हम

तलाश में शहर दर शहर खाक खंगाल रहा हूं,

बुजुर्गियत की हिदायतें कहां हो गयी हैं दफन

उस गुमशुदा तहजीब की मजार तलाश रहा हूं,

वक्त बदला सोच भी बदली है बहुत हद तक

बदलते वक्त के सबब की इबारतें खोज रहा हूं,

बदलते बदलते बदल दिया तमाम पुराना ढांचा

तब जाकर आई अक्ल फिजूल कसरत कर रहा हूं।।

“Pkvishvamitra”

Government !!हुकूमत!!

गर करनी है हुकूमत उन्हें ताजिंदगी इस मुल्क पर

फिर तो बस भूख से बिलबिलाती बेबस आवाम चाहिये,

मुंह से उबलता अल्फाजी दरिया मत समझ लेना मुफ्त

हरेक अल्फाज पर गूंजती हुई तालियों का दाम चाहिये,

ख्वाब हजारो हैं इन सियासी मदारियों के झोले में कैद

पूरे होंगे या नहीं होंगे मगर नुमायां करने के ईनाम चाहिये,

भूख बेबसी बदहाली का कैसे कर दिया जाये सफाया

सियासी जूते बनवाने के लिए तो इंसानी ही चाम चाहिये,

कौन कम्बख्त मानेगा रहबर जब पेट में आग नहीं होगी

रहनुमाई कायम किये रखने के लिए तो कोहराम चाहिये,

सियासत के कारोबार में तो नफी तो है ही हरामी शह

धंधेबाजों को तो आम के आम गुठलियों के दाम चाहिये,

रोता बिलखता कराहता कसमसाता रहे यह सारा जहां

सियासतदानों को ऐसा ही वीरान एक आसमान चाहिये,

उम्मीदों और नाउम्मीदियों के पालने झूलती रहे जनता

डुगडुगीबाजी के लिए मदारियों को बदस्तूर मज़मा चाहिये,

जमा नफी की घटा बढत करती रहे यह आवाम हमेशा ही

तख्तनशीनी के लिए मददगार बस एक चतुर ईमाम चाहिये।

Government !!

It is necessary to get the government back on this country. 

Then just roasting with hunger should be helpless, 

Mouth-free alpha-gas 

The price of the roasting applause on every alpha,

Khwab Thousands are imprisoned in the parlor of these political kingdoms 

Must be perfect or not, but should be rewarded for doing things, 

How to overcome hunger and helplessness 

To make political shoes, one should want a human being, 

Who will be hesitant when the stomach will not fire 

To maintain pragmani, you should take kohram, 

In the business of politics, if it is a blunt 

Shoppers should get the mango mangoes, 

I do not want to cry 

Such a desolation of politics should be a skies, 

People hanging in the cradle of expectations and hopes 

The guys should try to get rid of tears, 

Deposits continue to increase the profitability 

Helpful for Takhshanshi, just a clever imam.

“Pkvishvamitra”