All posts by ||PKVishvamitra||

रेत के असंख्य कणों में से एक कण मैं भी हूं यही मेरे अस्तित्व की वास्तविक नाप तौल है और यही मेरा वास्तविक परिचय है जो मुझे ज्ञात है।-प्रमोद कुमार एडवोकेट

Sorry Friends!!

Sorry Friends !! 

After a long gap, I have returned to the wordpress forum, have you come to remember me? I thank all those friends who have remembered me in this period.Pkvishvamitra!!

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The Reality!!असलियत!!

Sometimes the high rise buildings on their height 
Raises questions on their own basic fact, 
Buldhani’s are the foundations of old chittagong graveyards 
Tangled eyes show the status of the height, 
The sky also comes with powerful towers on the ground 
Something similar teaches books of history, 
They are hidden in the ruins of their ruins 
The scattered bricks of the walls show the seam of time, 
Black hair poverty in white hair 
The erosion caused by the tooth decay is shown, 
Freshly pressed rooms for fresh fresh air like Fafade 
Easy breaths tell the price of a broken sauce, 
There is also a few steps to go 
The calculation of the shaking dried leg burden, 
Throw away the burden of the burden from my shoulder to my friends 
In old age, everyone’s neck becomes dingy.
||असलियत||

कभी कभी उंची इमारतें अपनी बुलंदी पर इतराकर

अपनी ही बुनियादी औकात पर सवाल उठाया करती हैं,

बुलंदियों को होती हैं महसूस बुनियादें पुरानी सी कब्रें

ऊंचाई पर टंगी आंखे जमीन को हैसियत दिखाया करती हैं,

आसमान को ताकती मीनारें भी आ गिरती हैं जमीन पर

कुछ ऐसा ही तो पाठ इतिहास की किताबें सिखाया करती हैं,

खण्डहरों की बदहाली में ही छिपा है उनका सुनहरा कल

दीवारों की बिखरी हुई ईंटे वक्त का सितम दिखाया करती हैं,

सफेद बालों की अमीरी में झांकती काले बालों की गरीबी

दांतों के झडने से बने झिर्रियां असलियत दिखाया करती हैं,

ताजी ताजी हवा के लिए तरसते बंद कमरे जैसे फफेडे

आसान सी सांसों कीमत उखडी हुई सांसे बताया करती हैं,

चंद कदम चलना भी होता है कभी कभी बहुत ही दुश्वार

कंपकंपाती सूखी टांगे बोझ का हिसाब बताया जा करती हैं,

उतार फेंको गरूर का बोझ अपने कंधो से ऐ मेरे दोस्तों

बुढापे में तो सभी की ही गर्दनें डुगडुगी बन जाया करती हैं।

“Pkvishvamitra”

The Pain//दर्द!!

The pain is only buried in the brain 
Yet it is common to be pretending to be happy, 
It is dark inside and it is also dark outside 
In the thoughts, surely there is a procession of all the lamp, 
Dense fog sheet is like a living 
As much as the drumming puppets, 
The eyes are tears of happiness and also of gum 
This is an odd form of clouds roaming in the eyes, 
The longer the length of the sheet, the more the legs spread, who is here 
There is rain in the burials of wishes, 
Ever wishes of wishes and have ever dreamed of 
This is the craze of the incomplete Armaan of wanting to clap in the desire, 
In the courtyard of the mud puppet troupe 
The only one that is unreasonable is your fate, 
Thousands of unreliable burials buried in the graveyard of pain 
Is there any doom of night, even the buried ones? 
Troubled in the puzzle of the distressed Afsan 
It is a matter of just taking an independent human life.
||दर्द||

दर्द के अफसाने ही दफन हैं ज्यादातर दिमागों में

फिर भी खुश होने का दिखावा करना आम बात है,

अन्दर भी अंधेरा है और बाहर भी है घना अंधेरा ही

ख्यालों में तो जरूर सभी के ही चिरागों की बारात है,

घने कोहरे की चादर जैसी जिन्दगी की है खींच तान

थिरकते फुदकते पुतले जितनी ही तो सबकी बिसात है,

लरजते हैं आंखों में आंसू खुशी के भी और गम के भी

आंखों में उमडते घुमडते बादलों की यही तो औकात है,

जितनी लम्बी चादर है उतने ही पैर फैलाता है यहां कौन

मुरादों में छिपी ख्वाहिशों के झरोखों से होती हुई बरसात है,

कभी ख्वाहिशों की और कभी तमन्नाओं की है उधेडबुन

चाहत में गूंथी चाहत के अधूरे अरमानों की यह करामात है,

कठपुतले से बनकर नाचना ताउम्र ख्वाहिशों के आंगन में

गैरवाजिब बस एक यही तो फितरत तेरी ऐ आदमजात है,

दर्द के कब्रिस्तान में दफन हुए हजारों गैरमुनासिब मंसूबे

दफन हो चुके मंसूबों की भी क्या कोई कयामत की रात है,

दर्दीले अफसानों की पहेली में उलझी है तमाम कायनात

बस एक अदद इंसानी जिंदगी गुजार लेने की ही तो बात है।

“Pkvishvamitra”

Search!!तलाश!!

Life goes on hitting the ups and downs 
I am in search of hidden comfort in the hands of me, 
We are burdened with cumbersome minds 
I am looking for a halted prasamukun moment for me, 
Tala Talaiya and Darya feel the dry ground 
Not only thirst is left for me, 
Sweethearted trees are on the dunes of sand 
I am looking for a nude outfit with all the needs, 
Dancing in the courtyard without a wall 
Just like this, I am looking for a happy, 
Parinde Ghosla is made by wearing straws without getting tired 
I am looking for such a unimaginable hard-fought life, 
In the wanders, they snatch away all the peace of each other 
I am looking for the world to sleep, 
What a strange relationship with the thirst of the sea 
I am looking for such a marvelous fisherman
||तलाश||

उतार चढाव का शिकार होकर आगे बढती है जिन्दगी

हाथों की लकीरों में छिपे हुए सुकून की तलाश है मुझे,

बोझिल मन से ढोया है हमने उदासियों का बोझ हमेशा

मुद्दतों से एक ठहरे हुए पुरसुकून लम्हें की तलाश है मुझे,

ताल तलैय्या और दरिया सूखी जमीन महसूस होते रहे

प्यास ही ना रहे बाकी ऐसे आबे अलम की तलाश है मुझे,

बालू के टीलों पर उगी हुई झाडियों में ही खुश हैं ततैईयें

सारी ही जरूरतों से बेवास्ता एक घरौंदे की तलाश है मुझे,

बिना चाहरदीवारी के आंगन में नाचता है मोर मस्त होकर

बस कुछ ऐसे ही तो खुशनुमाँ आलम की तलाश है मुझे,

बिना थके तिनके इक्टठा कर बनाते हैं परिन्दे घौंसला

ऐसी ही बेबाक जद्दोजहद भरी जिन्दगी की तलाश है मुझे,

फिरकों में बंटकर छीनते हैं सब एक दूसरे का चैन सुकून

बेफिक्र होकर सो जाऊं मैं उस दुनियां की तलाश है मुझे,

समुन्दर का प्यास से है कैसा अजीबो गरीब रिश्ता नाता

खुश्कमिजाजी लगे फिजूल ऐसे समुन्दर की तलाश है मुझे।

“Pkvishvamitra”

Excuse!!बहाना

People born in every community are very happy here
Seeing each other’s bloody corpses
We could also have been happy like them
But we were not Hindus / Muslims / Sikhs / Christians,
They are entitled to save the chances of weeds
They are also spared for chances of mourning
The opportunity to gain and afford
We were not the characters of such a story,
By tightening it strong stakes of its own limits
Say one thing to be living in the limits
Land and tongue is their own bounty
We were not bound to any extent like Azad Parinde,
Easy to fight for them die
Eradicate and wipe out anyone
Flood of blood by the excuse of caste and religion
Regrettably, there were no such excuses in our grip,
The battle of life seems to be on the wager to live
The boiled brain that loses its humanity
Greedy game of eradication of Khilafat
Such was never the worst condition of this world before.

हर कौम में पैदा हुए लोग खुश हैं बेहद यहां

एक दूसरे की रक्तरंजित लाशों को देखकर

हम भी तो हो सकते थे खुश उनकी ही तरह

मगर हम हिंदू/मुसलमां/सिक्ख/ईसाई नहीं थे,

उन्हें हासिल हैं मातम के मौके बख्शने का हक

उन्हें बख्शता भी है कोई मातम मनाने के मौके

यह मौके हासिल करने और बख्शने की रवायत

ऐसे किसी किस्से कहानी के हम किरदार नहीं थे,

बांधकर वह अपनी अपनी हदों के मजबूत पुश्ते

एक दूसरे को हदों में रहने की बात कहा करते हैं

जमीन और जुबान है उनकी अपनी अपनी बपौती

हम जैसे आजाद परिन्दे किसी हद के पाबंद नहीं थे,

आसान है उनके लिए लडना झगडना मरना मारना

मिट जाना और किसी को भी मिटा देना बेरहमी से

जाति और धर्म के बहाने से लहू की नदियां बहाना

अफसोस हमारी पकड में ऐसे फिजूल बहाने नहीं थे,

वजूद की जंग में दांव पर लगती हैं जीने की हसरतें

उबाल खाया हुआ दिमाग खोता है अपनी आदमियत

खिलाफत को मिटा देने की वहशी दरिन्दगी का खेल

ऐसे तो पहले कभी इस दुनियां के खराब हालात नहीं थे।

“PKVishvamitra”

Moody!!//मिजाज!!

I’m stuck in all ages for which I 

They have regarded the macho rhetoric as their belief, 
The storm of emotions searching in the idols of the stones 
The diamond of jealousy has been considered as a human effigy, 
Something unfinished was some unfavorable spam burden 
In the dark, glowing fireplaces have been considered as champs, 
There is no echo now, no threat is inklabi now 
It is considered as martyrdom in suicide, 
Who is warm by burning the Armanans Holi here 
In the hands, the ulcers are considered to be fatal
The truth lies on the face, always badhera mask 
Have considered the hideous hideous in the curtain as a policy, 
Regarding the consequences, then do the brains 
Unaware that those people who believe in Faith, 
Every pain in the ground makes the chest in the sky 
Due to the eyes moisture absorbed with leaves, 
Meaning everybody involved in the journey of the blind is blind 
Heart and liver have been treated as a passion.

मिजाज!!
चुराता रहा हूं तमाम उम्र कुछ लम्हे मैं जिसके लिए

वो बेरूखी के मिजाज को अपना ईमान मानते रहे हैं,

पत्थरों की मूर्तियों में खोजते रहे जज्बात के तूफान

जिंदादिली के दैरो हरम को इंसानी पुतला मानते रहे हैं,

कुछ ख्वाब अधूरे कुछ मंसूबे अधूरे अनचाहा बोझ थे

अंधियारे में चमचमाते जुगनूओं को चिराग मानते रहे हैं,

ना कोई गूंज है अब ना कोई धमक इंकलाबी है बाकी

बेखुदी में की गयी खुदकुशी को ही शहादत मानते रहे हैं,

अरमानों की होली जलाकर कौन तापता है हाथ यहां

हाथों में पडे हुए छालों को तकदीरी लकीरें मानते रहे हैं,

सच्चाई के चेहरे पर पडा होता है हमेशा बदरूहा नकाब

परदे में छिपी हुई बदनीयत को पाक नीयत मानते रहे हैं,

अंजाम की परवाह तो किया करते हैं दिमागी तिजारती

अनाडी नही थे वह लोग जो वफा को ईमान मानते रहे हैं,

आसमान के सीने में चसका करता है जमीन का हर दर्द

आंखों की नमी को पत्तों से टपकी हुई ओस मानते रहे हैं,

मतलब परस्ती की दौड में शामिल हर शख्स है अन्धा

दिल और जिगर वाले दरियादिली को जुनून मानते रहे हैं।।

“Pkvishvamitra”

सन्नाटा!! Silence!!

Now the silent shadow is in the heart and the mind 

Bloody game continues in the name of Left and South Panthey, 
Now writing and speaking is the slave of the limits 
In this era of tension, the truth is also a sharp rider, 
He decides death sentence and insists himself 
It is heard that even with the fangs of the road, it is his journey, 
Her crown and trunk is decorated with blood clots 
The world is all set to make the shoes of their feet, 
All the messages have been shared with all the victims. 
In the pleasant months of Basant, there is also a rush of flowers, 
Hearing the death of AamAm panic 
The addiction of strength will go away, it is still the cruelty of Garroor.||सन्नाटा||
अब सन्नाटा सा छाया है हुआ दिल और दिमाग में

वाम और दक्षिण पंथके नाम पर खूनी खेल जारी है,

लिखना और बोलना भी है अब तो हदों का गुलाम

तंगदिली के इस दौर में सच भी तेजधार वाली आरी है,

मौत के फरमान सुनाता है वह समझकर खुद को खुदा

सुना है कि रास्ते के नुकीले पत्थरों से भी उसकी यारी है,

उसके ताज और तख्त पर सजावट है लहू के कतरों की

दुनियां को अपने पैर की जूती बना लेने की पूरी तैयारी है,

सहमी हुई है सबआवाजें सदमें की शिकार हैं सब हनक

बसन्त के खुशनुमां मौसम में भी उजडी हुई हरेक क्यारी है,

मुर्दा सी हो गयी है आवाम दहशत की आहट को सुनकर

उतर जायेगा ताकत का नशा अभी तो गरूर की खुमारी है।

“Pkvishvamitra”