Religion’S Shop!!धर्म की दुकान!!

What is doing while sleeping is the drama of gold 
Why the society wakes up by giving voice to that society, 
Rugged stereotypes are entangled in the net 
Why do you solve the rhetoric of abusive puzzles?
They are made up of religion’s Chola religion shop 
Why do you have such a horoscope, 
Play the game of dresses 
Why are you unaware of knowing / knowing everything? 
Glow of the world 
Why become blindfolded for salvation / salvation? 
Where God is hidden in God Narayan 
Why are the runners achieving unavailable, 
The sinner searches only for the path of expansion of sin forever 
Why do the bowels become disorders in front of them?
जागते हुए भी जो कर रहा है सोने का नाटक

उस समाज को क्यों आवाज देकर जगाते हो,

सडीगली रूढियों के जाल में उलझे हुई हैं जो

अबूझ पहेलियों के ताने बाने क्यों सुलझाते हो,

वे बने हैं पहनकर धर्म का चोला धर्म की दुकान

ऐसे बेहरूपियेपन को क्यों अपना शीश नवाते हो,

खेलते हैं पहनावे को बनाकर ढाल हवस का खेल

सबकुछ जानकर/देखकर क्यों अन्जान बन जाते हो,

जगत की मोहमाया के बंधन तोडने की अंधी ललक

मोक्ष/मुक्ति पाने की खातिर क्यों अंधभक्त बन जाते हो,

नर में कहां छिपा होता है परमेश्वरीक ईश्वरीय नारायण

अप्राप्य को प्राप्त करने वाले धावक क्यों बन जाते हो,

पापी तो खोजता ही है पाप के विस्तार का मार्ग सदा

इनके सम्मुख होकर नतमस्तक क्यों विकार बन जाते हो।

“PKvishvamitra”

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The Pain//दर्द!!

Check out @SirRavishKumar’s Tweet: https://twitter.com/SirRavishKumar/status/902942698260365314?s=09

Blowing in the Eyes 
Blizzards are heart-broken wounds, 
Desperate Succeeded to come out 
It has been signed, everything is finished, 
The buds crying in front of the little woods 
Understand that the sad eye opens up 
The lamb is put in front of the sheep 
By opening the door to the name of sure, 
Who has understood the dilemma of shame 
Silent, every person weighs their gains, 
Where do people read masked faces on the mask
Surely, a knife makes sure of murder, 
Carefully beware of A Baghban, these buds 
The poor people give each of the buds to the poor.
आंखों में उमडते घुमडते बेबस आंसू बनकर 

फफकते हैं बिलखते हैं दिल के दबे हुए जख्म,

बाहर आने के लिए हो चुकी बेताब सिसकियां

करती हैं मुनादी हो चुका है सबकुछ ही खत्म,

कमअक्ल बागबां के सामने रोती थी कलियां

समझेगा वो दुखडा आंखों की पटटी खोलकर

वहशी भेडियों के सामने डाल देते हैं वह मेमने

यकीन के नाम पर दिल के दरवाजे खोलकर,

समझा है कौन लाज के दुपटटे की कसमकश

खामोश है हरेक शख्स अपना फायदा तौलकर,

कहां पढते हैं लोग नकाब पर नकाब चढे चेहरे

यकीन की छुरी से यकीन का कत्ल हुआ करता है,

चौकस होशियारी से बचाओ ऐ बागबानों ये कलियां

हरेक कली रहे महफूज ये दिले गरीबां दुआ करता है।

“PKvishvamitra”

Way!!रास्ता!!

Time consuming toy 

She was playing with pakijas, 
Garur’s Badanuman Taj on his head 
God was mocking to prove, 
Understanding the World 
He was building the tehajib buildings, 
There were queues of the mirror around it 
Aankhe Mundand was embarrassing himself, 
The doors of the horror were in the grave 
He was preparing himself a gadder for himself, 
The raw bud was not able to blossom 
The effigy of Harmony was preparing Haram, 
Towel 
He was doing a soft hot meat business, 
It was easy to suppress untidy human screams 
His human being was buried in screams, 
The burden of waste wasted on the shoulder of life ruined 
Dadau was spoiling his way.वक्त को मानकर खरीदा हुआ खिलौना

वो पाकीजाओं से खिलवाड कर रहा था,

सिर पर लादकर गरूर का बदनुमां ताज

खुदा साबित होने का जुगाड कर रहा था,

समझ रही थी दुनिया जिसे अदबी बागबां

वो तहजीब की इमारतें बिस्मार कर रहा था,

यूं तो आईनों की कतारें थीं उसके आस पास

आंखे मूंदकर खुद को ही शर्मसार कर रहा था,

खौफ के दरवाजे हो चुके थे चौपट गरूर में

खुद के लिए खुद ही गडढा तैयार कर रहा था,

कच्ची कली नहीं बन पाई थी खिलकर फूल

हैवानियत का पुतला हरम तैयार कर रहा था,

फरेबी तराजू से तौलकर रूहानियत का सौदा

वह नरम गरम गोश्त का कारोबार कर रहा था,

बेबस इंसानी चीखें दबा देना लगा था आसान

अपनी आदमियत चीखों में दफन कर रहा था,

तबाह जिंदगी के कंधे पर बर्बाद आबरू का बोझ

लेकर बददुआयें अपना रास्ता खराब कर रहा था।

“PKvishvamitra”

The Factory//कारखाना!!

He stood up on this ground floor 

He wanted to fill his sky in arms, 
A statue of a leather-covered bone cage 
The world wanted to lock in the grasp, 
Does the swarm of firewood compete with the sun 
Himself wanted to be the land and the sky, 
He was spreading his kingdom to the blind 
A slight sank !! Wanted to be princes, 
Palace built on the grounds of intentions 
He wanted to decorate the hay with the physique of the living, 
Laughing rumor 
Mirror only wanted to show the mirror to the mirror, 
It was unnecessary that he trusted his belief 
He wanted to show god in his own shape, 
Understanding the people’s stupidity, their intelligence 
Wanted to run a fancy lavish factory.

!!कारखाना!!

वह तो खडा होकर इस ख्वाबी जमीन पर

बाहों में अपनी आसमान भरना चाहता था,

चमडे से ढका अस्थि पिंजर का एक पुतला

दुनिया को मुटठी में बंद कर लेना चाहता था,

जुगनूओं के झुंड का क्या सूरज से मुकाबला

खुद ही जमीन और आसमान होना चाहता था,

फैला रहा था वह अंधा होकर अपना साम्राज्य

एक मामूली सा रंक!! शहंशाह होना चाहता था,

इरादों की बारूदी बुनियाद पर बनाकर महल

जिंदा जिस्मानी बुतों से हरम सजाना चाहता था,

ठहाके लगाकर उडाता था वह समय की खिल्ली

आईना ही तो आईने को आईना दिखाना चाहता था,

बेवजह ही था उसे अपनी अक्ल पर फालतू भरोसा

अपनी शक्ल में जमाने को खुदा दिखाना चाहता था,

लोगों की बेवकूफी को समझकर अपनी होशियारी

 सनक भरी हवस का कारखाना चलाना चाहता था।।

“PKvishvamitra”

Sadhav-Part1/साध्व-पार्ट1

After the Dera Sacha Sauda Dehra being proved / proven, it has become necessary that we should explain the broad and rigorous definitions of Sadhus and Sadhus in detail, I would like to discuss this subject and this fact with my low knowledge. Will try 

Sadhya is literally indicative of achieving the goal of replacing the senses in a restrained state in a neutral form; the display of the living life of the operator of the tent does not seem to be in vain in any way, seeking brilliant dharmas Clothing, the inexhaustible desire to gain fame, accept yourself as God’s messenger. The Abiani dogma, Empire gives it had numerous female attendant arranged camp director Gurmeet Singh completely isolated from Sadhv and holiness Followed by thirst, dynastic system expansion calling.- respectively remaining in the upcoming parts.

साध्व!!

डेरा सच्चा सौदा के डेरा खोटा सिद्ध/प्रचारित हो जाने के उपरान्त यह आवश्यक हो गया है कि हम साध्व एवम् साधु के संदर्भ व्यापक तथा कठोर परिभाषाओं का विस्तृत विवेचना करें,मैं अपने अल्प ज्ञान के अनुरूप इस विषय तथा इस तथ्य की विवेचनात्मक विवेचना करने का प्रयास करूंगा,

साध्व इन्द्रियों को संयमित अवस्था में तटस्थीय स्वरूप में प्रतिस्थापित कर देने के लक्ष्य की प्राप्ति को प्राप्त करने का शाब्दिक सूचक है,डेरे के संचालक की प्रदर्शित जीवन यापन स्थिति किसी भी प्रकार से साध्व प्राप्ति के प्रति प्रयासरत प्रतीत ही नहीं होती है,भडकीले रंगों वाला पहनावा,प्रसिद्धि प्राप्त करने की अन्तहीन इच्छा,स्वयं को परमेश्वर के संदेशवाहक के रूप में स्वीकार करा लेने का अभियानी हठधर्मिता,साम्राज्य विस्तार की पिपासा,राजवंशीय प्रणाली को अनुगमित करती हुई असंख्य महिला सेविकाओं की व्यवस्था डेरा संचालक गुरमीत सिंह को साध्व तथा साधुता से पूर्णतया पृथक कर देती है।-क्रमशः शेष आगामी पार्ट में।

“PKvishvamitra”

Existence!!अस्तित्व!!

Luminous particles hidden in the sand 

Scattered stars in the sky 
Something like this is its existence, 
Implied assumptions in the future 
Currently Confused Schemes 
All together is the past, 
Discover your own introduction 
Weighing all of our own existence 
This is the ultimate conflict of all, 
Gems hidden in the womb of the sea 
Everyone’s destiny is to try 
There is a world entangled in competition, 
Familiar only real strangers 
Real is unrealistic 
Here knowledge is only ignorance of knowledge, 
Inherent internal creatures within the universe 
Vanishing view vision 
Natural creature of rain is rain, 
The beginning of the beginning is towards the end. 
Looking Forward To The Scientific Cosmos 
Only in the universe is the implanted universe.
अस्तित्व!!

रेत में छिपे हुए चमकीले कण

आसमान में बिखरे हुए सितारे

कुछ ऐसा ही अपना अस्तित्व है,

भविष्य में निहित परिकल्पनायें

वर्तमान में उलझी हुई योजनायें

सब मिलकर बना हुआ अतीत है,

अपने ही परिचय को सब खोजते

अपने ही अस्तित्व को सब तौलते

यही तो सबका अन्तर्द्वन्द्वीय द्वन्द्व है,

समुन्द्र के गर्भ में छिपे हुए हैं रत्न

सबकी ही नियति है यत्न प्रयत्न

प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ विश्व है,

परिचित ही है वास्तविक अपरिचित

वास्तविक ही होता है अवास्तविक

यहां ज्ञातव्य ही ज्ञान का अज्ञान है,

सृष्टि में ही निहित आंतरिक सृष्टियां

दृष्टि को दिग्भ्रमित करती हुई दृष्टियां

वृष्टि की प्राकृतिक निर्माता ही वृष्टि है,

प्रारम्भ ही तो है अग्रसर अन्त की ओर

खोज रहे हैं वैज्ञानिक ब्रह्मांड का छोर

ब्रह्मांड में ही तो प्रत्यारोपित ब्रह्मांड है।।

“PKvishvamitra”

Thanks!!धन्यवाद!!

Thanks !! wordpress !! I have got a global family of 1000 members on wordpress, thanks to all the respected friends who have given me the number of this “friend world” to 1thousand and to increase my excitement while giving me the honor, this is my first Achievement which has been made available to me by authors present on WordPress, it is fine that we may not ever be able to come face to face with each other and meet each other, After this our and your friendly, ideological relationship will continue to grow faster through this information technology and writing, I believe, I express my heartfelt gratitude to all the writer friends, will keep my love towards me in such a way, always for the sake of your Your friend, PKvishvamitra, a debtor of love and brotherhood.

धन्यवाद!! wordpress!! 1000 सदस्यों का वैश्विक परिवार मुझे wordpress पर मिला है,उन सभी सम्मानित मित्रों का भी धन्यवाद जिन्होंने मेरे इस “मित्र संसार” की संख्या 1हजार तक पहुंचाई है और मुझे अपनत्व प्रदान करते हुए मेरा उत्साह बढाया है,लेखन की दुनिया में मेरी यह पहली उपलब्धि है जो wordpress पर मौजूद लेखकों ने मुझे उपलब्ध कराई है,यह ठीक है कि शायद हम अपनी इस जिन्दगी कभी आमने सामने आकर एक दूसरे से नहीं मिल पायेंगे लेकिन इसके उपरान्त भी हमारा और आपका स्नेहिल,वैचारिक रिश्ता इस सूचना तकनीक और लेखन के जरिये प्रगाढ होता रहेगा,ऐसा मुझे विश्वास है,अपने सभी लेखक मित्रों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं,अपना प्रेम मेरे प्रति इसी प्रकार बनाये रखियेगा,सदैव सदैव के लिए आपके प्रेम तथा अपनत्व का ऋणी आपका अपना मित्र- PKvishvamitra