“फस्ले गुल”

माना कि जन्नत को उतारकर अहले जमीन पर 

जन्नत को जमीने जन्नत नहीं बनाया जा सकता है।।

इस सच्चाई से रहेगी हमेशा गैरइत्तेफाकी हमारी

हालाते दोज़ख से मुल्क बचाया नहीं जा सकता है।।

ये लाचारियां बेचारगियां आई हैं कहां से आखिरकार

निजामें दुनियावीं को क्यों संवारा नहीं जा सकता है।।

फर्के बदनीयत ने ही उजाडे हैं हमेशा अमनौं चमन

लफ्फाजी से उजडा चमन बसाया नहीं जा सकता है।।

आंधियों में चिराग रोशन करने की जीतती हैं जिदें

वहम है कि मिटते वजूद को बचाया नहीं जा सकता है।।

मिट मिटकर फिर आई है वजूद में तमाम तहजीबें

क्यों ख्वाबे तामीर आखों में बसाया नहीं जा सकता है।।

गर्दो गुब्बार के साये में ही पनपा करती है जिन्दगियां

फिर क्यों भला दिलेदरिया को बहाया नहीं जा सकता है।।

फस्लेगुल की चाहतों को यूं ना समेटा करो ऐ मेरे दोस्तों

नहीं है कोई ऐसा ऊंचा पहाड जो लांघा नही जा सकता है।।

“PKVishvamitra”

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