“मंथन”

हाहाकारी वातावरण में

मानवीय करूण क्रन्दन

सम्मान की बलिवेदी पर

अपराधियों का अभिनंदन।।

रंक सापेक्षिक पुज्यनीय नृपता

कलुषित मस्तिष्कीय तांडवता

रूदनमय मनोसंतापीय नृत्यता

अभिचारी मस्तकाधीन चंदन।।

मानुष मनुज अपमानित

घोष उदघोष नाट्यमंचित

विकलांग नेतृत्वीय तंत्रिका

कुंठित कुटिल कुबेर नंदन।।

अनाचार यौनाचार उन्मुक्त

साम दाम दंड भेद उपयुक्त

नीति अनीति समस्त प्रयुक्त

औचित्यहीन अपात्रक वंदन।।

निराशा हताशा कुंठा प्रबल

मनोअवसादी संताप अटल

अनैतिक अत्याचारी सबल

संवेदना अभिनयोचित मंचन।।

दारूण दरिद्र नारायण नर

दासत्वपरक स्वैच्छिक वर

पाप प्रवृत्त समस्त चराचर

आवश्यकतातीत आत्ममंथन।।

“PKVishvamitra”

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6 thoughts on ““मंथन””

  1. “मंथन”
    कितना अच्छा ओर मंथन किया है आपने ठाकुर जी।आज तो आपकी कविता में एक महाकवि की छवि दिखाई दे रही है।बहुत ही सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है।

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  2. मित्र आपके शब्दों से सुकून मिलता है कि हिंदी भाषा जीवित है।

    कविता की बात करे तो इन पंक्तियों का पूरा मतलब एक-दो बार पढ़ने पर समझ ना आया। ये आपकी कविता में जितने भाव समाहित है, ये मांगते है कि इन्हें बार-बार पढ़ा जाये। और पाठक जितनी दफा इन्हें पढ़ेगा, नवीन विचार मिलेंगे।

    धन्यवाद इस उत्कृष्ट कविता के लिए। दिन धन्य है।

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    1. धन्यवाद मित्र!! खेद है कि मेरी रचनायें मस्तिष्कीय व्यायाम का विषय होती हैं,संभवतः यही इन रचनाओं का मौलिक गुण है,तत्पश्चात भी सरल भाषा में भी प्रस्तुति का प्रयास करूंगा,उत्साहवर्धन करने के लिए पुनः आपका धन्यवाद/आभार!!

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      1. मित्र मेरा यह आशय नही था कि आप अपनी सुंदर भाषा का उपयोग सरल करे। ऐसा करना ना तो आपके पाठको के साथ न्याय करेगा, ना ही हिंदी भाषा के लिए भी। आपका लेखन अत्यंत सुंदर है, इसे ऐसा ही रखे।

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