“जहर”

जिंदगी समझकर जिया है जिसे

वो जामें जहर सिवा कुछ नहीं थी

अल्फाजों की लडियों में पिरोया जिसे

वो अनकही कहानी के सिवा कुछ नहीं थी।।

शक्ले समुन्दर में मौजूद थे सडांधे तालाब

इश्के मछैरी वहां कोई पाकीजा नहीं थी।।

कौन सुनता तुरब्ते जिस्म की सिसकियां

बुते खूबसूरत में जज्बाते जान नहीं थी।।

हमदामन थे तमाम बदगुमानियों के शिकार

रिश्ताये बेखुद के मुंह में जुबान नहीं थी।।

छिपा था तिकडमौं आजमाईश में खंजर

दर्दौ तकलीफ कोई इत्तफाकन नहीं थी।।

साबित थे हमदर्द सभी शातिराना कातिल

निगाहे खुद में कोई गुनाहगारी नहीं थी।।

दर्ज थी ज़ेहन में ताल्लुकातन कर्जदारियां

रिश्ताये अदालत में कोई उजरदारी नहीं थी।।

पीठ भी हमारी थी और खंजर भी हमारा ही

दस्ते चाहत के वार में कोई बेख्याली नहीं थी।।

रखना चाहते थे संभालकर मेरा कतराये लहू

दिले बेरहम के मकान में कोई अलमारी नहीं थी।।

सिसकियां सजाया करती हैं अब मजारे फकीरा

शुक्र है ऐ मेरे खुदाया मंजिले मौत सुनसान नहीं थी।।

“PKVishvamitra”

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15 thoughts on ““जहर””

  1. ठाकुर जी, जहर में बहुत भाव डाले है आपने जो आज की जिंदगी में होता भी है।लेकिन अगर कोई अपना होता है तो वो कभी आपको जहर पिला ही नहीं सकता है।बहुत ही अच्छा लिखते है आप

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