आज की कविता(बुरा मत मानना)

मैं तो दिल खोलकर फेंकता रहा,

वह गर्ज-ऐ-दोस्ती में लपकते रहे।।

ये दोस्ती निभाने की ललक ही थी,

वह बकझक को शायरी मानते रहे।।

क्या क्या फेंक दिया है अल्हड अलमस्त ने,

देखे बिना अनगढ कंकरों को संभालते रहे।।

अल्फाजिया उबलाई बनी थी जो उगलाईयां

रहमें दिल अज़ीज दोस्त उसे शायरी कहते रहे।।

ये सबब है जिगरे यारों की हौसलाअफजाई का

चाहते बेलौस की बारिश में भीगकर बकियाते रहे।।-PKVishvamitra

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14 thoughts on “आज की कविता(बुरा मत मानना)”

  1. ठाकुर जी, आपकी हर कविता में एक अलग ही भाव पढ़ने को मिलता है।प्रत्येक भावों को बहुत ही सुन्दर ढ़ग से अभिव्यक्त करने की महारत हासिल है आपको।बहुत ही अच्छी कविता लिखी है।

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