बन्दगी!

यह तो है पुरसुकूँ इबारत भी और बुलन्द इमारत भी

मेरे ख्यालिया ख्वाबों की और जुनूनी इरादों की इसे

कहोगे बादहू मौत मेरी मजार तो तकलीफ नहीं होगी।।

हर ख्वाबों ख्याल पाला है जेहनियत की कोख में मैने

पुरकशिश तस्सवुर को संजीदगी से तामीर करते हुए

यकीनन वक्ते रूखस्ती में फिक्रे मश़रूफियत नहीं होगी।।

दुनियां में मौजूद हर एक शह है कैद मेरे दिमागे कब्र में

तज़ुरबातौ अहसास के खजाने हैं असबाबे दौलत मेरी

कसम से सफरे रूहानी में भी कोई कैफियत नहीं होगी।।

जिन्दगी के मायनों में जिन्दगी को जीया है जी भरकर

इंसानी कदौकाठी में पनपाया है पोश़ीदा आदमियत को

तयशुदा रहमें खुदा की हाजिरी में शर्मिन्दगी नहीं होगी।।

हिदायते नस्ल की खातिर मिसले मिसालें कहां हैं कम

किताबाते जिन्दगी के हर एक बरखे पर जिंदगी है दर्ज

नेक नीयती है किश्ती इससे बेहतर कोई बंदगी नहीं होगी।।-‘PKVishvamitra”

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10 thoughts on “बन्दगी!”

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