मायनों की तलाश!

तमाम उम्र की है जिन्दगी के असल मायनों की तलाश

हासिल मगर कुछ मुआयने ही बनकर रह जाया करते हैं।।

समझने की कोशिशें तो करते रहे हैं सारी दुनियां को

बरखे मगर तलाशिया कुछ अधूरे रह ही जाया करते हैं।।

फेहरिस्त बनाकर तय करते हैं लोग दायरे हदे हदिया

मगर बेख्याल परिन्दे दाना चुगकर उड जाया करते हैं।।

बहावी पानी कब देता है दरों दीवारों को इज्जत

तूफां ख्याले समुन्दर क्यों हदों में कैद हो जाया करते हैं।।

कदमों की बिसात से बाहर की बात है पैमाईशे जहां

बेपैर ख्याली कसरतिया उम्दा काम कर जाया करते हैं।।

जितना सोचा उतना उलझा उलझावी मकडजाल में

अच्छे हैं वह बेफिक्रे जो चादर तानकर सो जाया करते हैं।।

ये जमीं वैसी की वैसी ही है आसमां अपनी जगह पर है

क्या क्या तलाशने की खातिर हम कहां खो जाया करते हैं।।

मायनों की बेसिरा बेखात्मा तलाश की चाह में उलझकर

औरों की खातिर एक मुआयना बनकर रह जाया करते हैं।।-PKVishvamitra

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17 thoughts on “मायनों की तलाश!”

    1. स्नेही रजनी जी,आपके तथा अन्य मित्रों के द्वारा किया जाने वाला उत्साहवर्धन हमें लेखक बना डालेगा,आपके स्नेहिल उत्साहवर्धन के लिए सदैव आपका आभारी।

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