!!औरत!!

रोटी कपडा और एक अदद आसरे की खातिर

वह बंदिश-औ-गुलामी की कब्र में दफन हो गयी,

सहूलियत की सलीब पर लटकाकर अपना वजूद

बिना मजूरी की घरेलू नौकरानी सी बनकर रह गयी,

रिवाजिया रिश्ते का अजीब सा है एक फरेबी झांसा

जिसमें उलझी इंसानी जिंदगी औरत बनकर रह गयी,

बेजज्बा गरूरों का जिस्मानी बुत बन गया हुक्मरान

वह तो हुक्में गुलाम एक अदद बांदी बनकर रह गयी,

जिन्दगी के असल मायनों में क्या है इंसानी जिन्दगी

तलबे जायका जिन्दगी एक ख्वाहिश बनकर रह गयी,

रिश्ता-ऐ-नाजुक की दहशत रही सिर पर सवार हमेशा

हिदायतें तहज़ीब एक मजबूत दीवार बनकर रह गयी,

समझना था और बांटना था दर्दे सिसक आगे बढकर

उफ!!कम्बख्त बादहू दर्दे ब्यानी सिसककर रह गयी,

औरत ही तो थी औरत ही तो है जिस्मानियां तौर पर

अहसासे वफा चलता फिरता पुतला बनकर रह गयी।-“PKVishvamitra”

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11 thoughts on “!!औरत!!”

  1. “सहूलियत की सलीब पर लटकाकर अपना वजूद
    बिना मजूरी की घरेलू नौकरानी सी बनकर रह गयी”
    Very true. A woman earning more than her husband or even posses a position more powerful than her husband, she had to sacrifice her wishes and happiness so as to make others happy. She is not weak but this is her unending love which people take for granted.

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. Sirji, Pramod Kumarji, I am your biggest fan in your fan following of WordPress.

    You are undoubtedly Incredible…

    मुझे वास्तव में गर्व है की मैं आप जैसे महानुभाव से मिल पाया.. मैं आप का हृदय से अभिनन्दन करता हू और उस परमपिता परमेशवर को धन्यवाद कहता हूँ, जिसकी कृपा से आप से मिलना संभव हुआ |

    इस बेमिसाल रचना के लिए हर एक रचनाकार आपका आभारी रहेगा…

    Brilliant…

    Liked by 1 व्यक्ति

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